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प्रोसेसिग व पैकेजिग के अभाव में फुटपाथ पर आया मखाना (जागरण विशेष)

-- हाल के दिनों में सरकारी मदद मिलने से इस खेती की तरफ किसानों का रुझान और बढ़ा है। इससे इस खेती का रकबा इस इलाके में बढ़ा है।

सुनील कुमार, सुपौल : मखाना उत्पादन मेफोटो-23 एसयूपी-13 कोसी की अपनी एक अलग पहचान रही है। यहां के किसान वर्षों से इस खेती को करते आ रहे हैं। हाल के दिनों में सरकारी मदद मिलने से इस खेती की तरफ किसानों का रुझान और बढ़ा है। इससे इस खेती का रकबा इस इलाके में बढा़ है। यहां के उत्पादित मखाना का स्वाद देश-विदेश के लोग चखने के आदी हैं। देश में उत्पादित कुल मखाना का 70 फीसद उत्पादन कोसी और सीमांचल के क्षेत्र में होता है लेकिन प्रोसेसिग और पैकेजिग की व्यवस्था नहीं रहने के कारण यहां के किसानों को इसका सही लाभ नहीं मिल पाता है। यहां के उत्पादित मखाना का पैकेजिग कर इसका लाभ कोई और उठा ले जाते हैं। मजबूरी बस यहां के किसान उत्पादित मखाना को चौक चौराहे या बाजार में घूम घूम कर बेचने को मजबूर हो रहे हैं।

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मखाना कारिडोर से जोड़ा गया जिले का जलजमाव वाला क्षेत्र
कोसी प्रभावित सुपौल जिले में मखाना की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है। खासकर कोसी नदी से सटे हुए क्षेत्र जहां सालों भर पानी का जमाव रहता है जिसमें अन्य फसल उगाना संभव नहीं है वैसे खेतों में मखाना की ही खेती की जाती है। लेकिन किसानों के पास समुचित संसाधन नहीं रहने के कारण प्रोसेसिग और पैकेजिग का कार्य दूसरी जगह किया जाता है जिससे मखाना उत्पादन किसानों को उचित कीमत नहीं मिल पाती है। हाल के दिनों में भोला पासवान शास्त्री कृषि महाविद्यालय पूर्णिया के मखाना विशेषज्ञों द्वारा इस क्षेत्र को मखाना कारिडोर से जोड़ा गया। उस समय एक जिला एक उत्पादन के तौर पर जिले को मखाना उद्योग के लिए चिन्हित भी किया गया। यहां तक कि जिले को मखाना जिला का दर्जा भी दिया गया। बात यहां तक हुई कि सरकार किसानों को 10 लाख तक अनुदान देगी। इससे किसान उत्पादित मखाना के प्रोसेसिग से लेकर पैकेजिग तक कर पाएंगे। इसके लिए प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उन्नयन योजना से भी जिले के किसानों को जोड़ा गया लेकिन स्थिति है कि आज किसानों के उत्पादित मखाना को कोई पूछने वाला नहीं मिल रहा है। किसान औने-पौने दामों पर मखाना बेचने को मजबूर हैं। परिणाम है कि किसानों को उनके उत्पादन का सही लाभ उन्हें नहीं मिल पा रहा है।
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किसानों का है कहना
मखाना उत्पादन से जुड़े किसानों का कहना है कि सीमांचल कोसी और मिथिलांचल के जिले में पूरे देश में उत्पादन का 70 फीसद में मखाना होता है। सुपौल जिले में करीब 12 हजार हेक्टेयर खेतों में इसकी खेती होती है। सबौर वन प्रभेद आने के बाद से अब साल में दो बार इसकी खेती होने लगी है। अभी यहां का मखाना देश के कई भागों में भेजा जाता है लेकिन प्रसंस्करण उद्योग नहीं लगने से किसानों को इसका उचित लाभ नहीं मिल पाता है। सरायगढ़ के किसान विजय यादव, किसनपुर के बलराम चौधरी आदि बताते हैं कि यहां उत्पादित मखाने की गुणवत्ता अधिक होने के कारण इसकी मांग काफी अधिक है। हर साल बाहर से व्यापारी भी यहां आते हैं परंतु मखाने काीजो कीमत होनी चाहिए वह वह नहीं लगाते हैं। ऐसे में किसानों को औने-पौने दामों पर मखाना बेचने की मजबूरी रहती है। छोटे किसान तो बाजार बाजार घूमकर मखाना बेचते हैं।
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बोले कृषि विज्ञानी
कृषि विज्ञान केंद्र राघोपुर के कृषि विज्ञानी डा. मनोज कुमार बताते हैं कि मखाना प्रसंस्करण उद्योग लगाने को लेकर आरंभिक पहल शुरू कर दी गई है। इसको लेकर भोला पासवान शास्त्री कृषि कालेज पूर्णिया द्वारा प्रस्ताव सरकार को भेजा गया है। मंजूरी मिलते ही इलाके में प्रोसेसिग और पैकेजिग का कार्य होने लगेगा।

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