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तिरंगा लहराते अंग्रेजों की गोली से शहीद हुए थे जगदीश लाल

तिरंगा लहराते अंग्रेजों की गोली से शहीद हुए थे जगदीश लाल

- महज 16 साल की उम्र में तिरंगा की शान में दे दी अपनी जान
- आज तंगहाली में जी रहा है शहीद के भाई का परिवार
विनोद सुमन, पीरो (भोजपुर) : गुलामी की जंजीर को तोड़ने के लिए लंबी लड़ाई लड़ी गई और हर जिले और गांव के लोगों ने आजादी की लड़ाई में अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। ऐसे ही सेनानियों में पीरो प्रखंड के बचरी गांव के शहीद जगदीश लाल का नाम आता है। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में महज 16 साल की उम्र में कूद पड़े और अंगेजों की गोली के शिकार होकर देश के लिए अपनी जान दे दी। इनसे जुड़ा परिवार आज गांव में अभाव में जी रहा है।

आजादी से पहले भोजपुर शाहाबाद जनपद का हिस्सा था। इसी जनपद के सासाराम शहर में रहकर वे पढ़ाई कर रहे थे। इसी दौरान महात्मा गांधी के आह्वान पर अन्य सेनानियों के साथ वे अंग्रेजी सरकार के खिलाफ सासाराम की सडकों पर तिरंगा लेकर उतर आए। तिरंगा फहराने की कोशिश में 14 अगस्त 1942 को वहां हुई फायरिंग में उन्होंने सीने पर गोली खाई और शहीद हो गए। देश की आजादी के बाद सरकारी दस्तावेजों में शहीद जगदीश लाल का नाम अवश्य दर्ज हुआ, लेकिन बाद के दिनों में वे पूरी तरह भूला दिए गए । पीरो उच्च विद्यालय परिसर में शहीदों की याद में लगाए गए शिलापट्ट पर भी उनका नाम दर्ज है, पर उनकी शहादत को याद करने के लिए यहां कभी कोई समारोह नहीं हुआ। बचरी गांव में शहीद जगदीश के सगे संबंधी मौजूद हैं जो अपने पूर्वज की उपेक्षा से खासे मर्माहत हैं। शहीद के परिवार से जुडे़ शिक्षक पंकज सिन्हा, गोविंद लाल, रीतेश लाल बताते हैं कि गांव में शहीद के नाम पर स्मृति द्वार बनाने व उनकी प्रतिमा लगाने के लिए सांसद, विधायक से लेकर मुख्य मंत्री तक गुहार लगाई गई, लेकिन कभी किसी ने कोई ध्यान नहीं दिया। बचरी निवासी संतोष सिंह उर्फ पप्पू यादव कहते हैं कि जगदीश लाल की शहादत दिवस पर सरकारी स्तर पर कार्यक्रम होना चाहिए था, लेकिन सरकारी उपेक्षा के कारण ऐसा कुछ नहीं हो पाता है।
तंगहाली का जीवन गुजार रहे स्वजन
वतन के लिए जान की कुर्बानी देने वाले शहीद जगदीश लाल का परिवार तंगहाली में है। परिवार में उनके दो भाईयों में से त्रिपुरारि सहाय उर्फ घूरन लाल भतीजा गोविंद जी व रीतेश कुमार सहित कई अन्य लोग हैं, जो बमुश्किल अपना पेट भर पा रहे हैं । परिवार के लोग आज भी झोपड़ीनुमा मकान में रहते हैं। जगदीश लाल के भतीजे पर्याप्त शैक्षणिक योग्यता होते हुए भी नौकरी के लिए भटक रहे हैं। इनके पास स्वतंत्रता सेनानी उत्तराधिकारी का प्रमाण-पत्र नहीं है, ऐसे में सरकारी सेवा में स्वतंत्रता सेनानी के घरवालों को मिलने वाले अधिभार का लाभ नहीं मिल पा रहा है। गोविंद जी बताते हैं कि एक शहीद का परिजन होने के नाते जो सुविधाएं व लाभ उनके परिवार को मिलना चाहिए वह आज तक नहीं मिला है। शहीद जगदीश लाल के भाई त्रिपुरारि सहाय उर्फ घूरन लाल कहते हैं कि दुख तब होता है, जब उनके परिवार को यहां विभिन्न अवसरों पर आयोजित होने वाले सरकारी समारोहों में पूछा तक नहीं जाता है।

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