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वारिसलीगंज को बिजनेस सेंटर के रूप में विकसित करने में मारवाड़ी समाज का अहम योगदान

1910 के बाद वारिसलीगंज बाजार में हुआ था मारवाड़ी परिवार का आगमन



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हाल के वर्षों में हुआ है इन परिवारों का पलायन
अशोक कुमार, वारिसलीगंज (नवादा): वारिसलीगंज बाजार को सजाने एवं संवारने में मारवाड़ी परिवारों की अहम भूमिका रही है। छोटा सा कस्बा को इन परिवारों ने अपने व्यवसायिक कला कौशल से सजा धजाकर वृहद बाजार बना दिया है। मूलरूप से खेती किसानी पर निर्भर बाजार में आने के बाद कृषि आधारित व्यवसाय चल पड़ा था। सन 1910 से 1920 के बीच करीब एक दर्जन परिवार वारिसलीगंज को अपना स्थाई ठिकाना बना लिया। कुछ गल्ले का व्यवसाय तो किसी ने गन्ना पेराई का मिनी उद्योग स्थापित कर वारिसलीगंज के किसानों की खेती को प्रोत्साहित किया।

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सबसे पहले 1910 में पहुंचा मारवाड़ी परिवार
-वारिसलीगंज बाजार के गुमटी रोड निवासी 90 वर्षीय श्याम सुंदर सुल्तानिया कहते हैं कि सबसे पहले मेरी चौथी पीढ़ी के प्रसादी मल बंका वर्ष 1910 में राजस्थान के सूरजगढ़ से आकर वारिसलीगंज में अपना बसेरा बनाया। उन्होंने गल्ला (अनाज) का व्यवसाय शुरू किया। बाद में राजस्थान से ही आये लालचंद रामेश्वर लाल के पूर्वजों द्वारा वारिसलीगंज बाजार में खांडसारी मिल की स्थापना की गई। जिससे क्षेत्र के किसानों में गन्ना उत्पादन के प्रति रुझान बढ़ा। समयांतराल वारिसलीगंज में दो अन्य मारवाड़ी परिवारों ने भी शहर में दो गुड़ मिल स्थापित किया। जिसमें विष्णु/दुलीचंद गुड़ मिल तथा काशी प्रसाद कमलिया का गुड़ मिल शामिल था। इन मिलों में क्षेत्र के किसान अपना गन्ना बिक्री कर नकद राशि प्राप्त करते थे। इस कारण किसानों के साथ साथ व्यवसायियों में संपन्नता आई। जबकि कुछ परिवार उर्वरक, नमक, कपड़े और किराना के व्यवसाय से जुड़कर वारिसलीगंज को बिजनेस का अच्छा प्लेटफार्म बनाया। धीरे धीरे बाजार जम गया और दूर दराज के लोग खरीदारी करने वारिसलीगंज आने लगे।
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कौन कौन परिवार पहले आया
- साल 1910 से 1920 के बीच अधिकांश मारवाड़ी परिवार राजस्थान के विभिन्न जिलों से आकर वारिसलीगंज में अपना व्यवसाय शुरू किया। जिसमें प्रमुख हैं, लालचंद-रामेश्वर लाल, श्रीलाल अग्रवाल, टीकू लाल अग्रवाल, सीताराम-राधा कृष्ण जैन, केदारनाथ बंका, जयकिशुन पड़िया, मोतीलाल सुल्तानियां, काशी प्रसाद कमलिया आदि आदि परिवार या उनके पूर्वजो ने वारिसलीगंज को व्यवसाय के ²ष्टिकोण से चुनाव कर अपना आशियाना बनाया। जब इन परिवारों का व्यवसाय चल पड़ा तब अन्य कई परिवार जिसमें पकरीबरावां के धमौल से बक्शी राम शिवपाल राम का परिवार भी वारिसलीगंज आकर अपना व्यापार बढ़ाया।
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कहां कहां के लोग खरीदारी को आते थे वारिसलीगंज
- अंगेजी हुकूमत के समय से ही वारिसलीगंज बाजार जिले के अन्य बाजारों के अपेक्षा काफी सुसज्जित थी। दूर दराज के किसान अपने खेतों की फसलों यथा गन्ना, चावल आदि की उपज को बिक्री के लिए बाजार लाते थे। नवादा जिले के अलावा शेखपुरा जिले के सिरारी, जमुई जिले के सिकंदरा, नालंदा जिले के गिरियक व कतरीसराय इलाके के लोगों का प्रमुख बाजार वारिसलीगंज था। जिले का एक मात्र बाजार समिति वारिसलीगंज में ही हुआ करता था।
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1995 के बाद शुरू हो गया पलायन
-अनाज व्यापारी के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त वयोवृद्ध श्याम सुंदर सुल्तानियां कहते हैं कि जब वारिसलीगंज में चीनी मिल की स्थापना हो गई तब गुड़ एवं खंड़सारी चीनी मिल स्वत: बंद हो गया। बावजूद चीनी मिल चालू होने से लोगो के व्यवसाय में और वृद्धि हो गई। किसानों को नकद आमदनी से बाजार में व्यवसाय काफी फलने फूलने लगा। इसी बीच 1993 में चीनी मिल बंद हो गई और 1995 से वारिसलीगंज इलाके में जातीय हिसा प्रतिहिसा का दौर शुरू हो गया। फलत: कुछ मारवाड़ी परिवार दूसरे महानगरों में जाकर अपना व्यापार शुरू करना प्रारंभ कर दिया। जबकि कुछ परिवारों के बच्चों का आकर्षण सरकारी नौकरियों के प्रति होने लगा। फलत: वारिसलीगंज से कई परिवार अपना आशियाना बदलने लगा।
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पठन-पठान व नौकरी के प्रति बढ़ा रुझान
-मूलरूप से व्यापार के प्रति समर्पित मारवाड़ी परिवारों के बच्चों की अभिरुचि शिक्षा के प्रति बढ़ गई। मदन लाल सुल्तानियां के पुत्र संदीप सुल्तानियां का चयन भारतीय प्रशासनिक सेवा में हो गया। वे वर्तमान में तेलंगाना सरकार में मुख्य सचिव के पद पर कार्यरत हैं। जबकि उनके भाई बिष्णु कुमार सुल्तानियां व संजय सुल्तानियां चार्टेड अकाउंटेंट के रूप में ख्याति प्राप्त है। संजय सुल्तानियां की पत्नी रिलांयस कंपनी में अभियंता हैं। स्व. परमेश्वर जाजू के पुत्र दीपक जाजू दंपती फिलहाल अमेरिका में प्रसिद्ध चिकित्सक के रूप में सेवा दे रहे हैं। इस प्रकार से दर्जनों परिवारों का नई पीढ़ी के लोग विभिन्न सरकारी व गैर सरकारी नौकरियों में जा कर अन्यत्र बस चुके हैं। धीरे धीरे उनके परिवार का भी पलायन हो चुका है। कुल मिलाकर वारिसलीगंज को विकसित बाजार का स्वरूप प्रदान करने व किसानों में कृषि के प्रति रुझान पैदा करने में मारवाड़ी परिवारों का अहम योगदान है।
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