मिट्टी की उर्वरक शक्ति बढ़ाने के लिए प्रयासरत हैं बसंत

पूर्णिया। रसायनिक खाद के कारण मिट्टी की गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव अब सबके सामने है। मानव और पर्यावरण स्वास्थ्य भी इससे अछूता नहीं है। जैविक खेती के प्रति अब किसानों का भी झुकाव बढ़ा है। यह समय की आवश्यकता भी है। बसंत यादव इस दिशा में प्रयासरत हैं। बसंत यादव 12 वर्षों से वर्मी कंपोस्ट केंचुए से तैयार कर रहे हैं तथा तैयार जैविक खाद को किसानों के बीच वितरित करते हैं। बसंत ने 2008 में राष्ट्रीय बागवानी मिशन के अंतर्गत यह कार्य प्रारंभ किया। आइसेनिया पोरिया नामक केंचुए प्रजाति से 500 क्विंटल जैविक खाद वसंत तैयार कर लेते है। इससे 12 से 20 एकड़ भूमि के लिए पर्याप्त जैविक खाद मिल जाता है। इसको किसानों के बीच वितरित करते है ताकि मिट्टी की गुणवत्ता बच सके। खेती की उपज भी नहीं घटती है और मिट्टी की उर्वरा शक्ति भी बनी रहती है। बसंत बताते हैं कि किसान जब तक अपनी खेती की लागत न्यून नहीं करेंगे उनकी आमदनी दोगुनी नहीं होगी। वे तभी आत्मनिर्भर हो सकते हैं जब खेती वैज्ञानिक तरीके से करें।


केंचुआ से तैयार करते हैं जैविक खाद --
खास किस्म का केंचुए का इस्तेमाल करते है। वेस्ट सामग्री और गोबर के उपयोग कर इस केंचुए की मदद से कई टन जैविक खाद तैयार की जा सकती है। बसंत का मानना है देसी गाय का कोई विकल्प नहीं है। गोबर और गोमूत्र सभी उपयोगी है। अब वे कीट नाशक के तौर पर वर्मी वाष्प भी तैयार कर रहे है। इसको फसल में छिड़काव कर कीट से फसल की रक्षा की जा सकती है। केंचुआ से जब जैविक खाद तैयार होती है उसका कुछ तरल पदार्थ अलग टैंक में संग्रहित कर लिया जाता है। उसमें गोमूत्र मिला पानी में घोल कर कीट नाशक के तौर पर स्प्रे किया जाता है। 2008 में महज तीस हजार की राशि से यह प्रारंभ की गई थी। तब केंचुआ को बाहर से मंगाना पड़ा था। अब इस खास किस्म का केंचुआ उनके पास उपलब्ध है। इसको अन्य किसानों को उपलब्ध करा रहे हैं ताकि जो भी जैविक खाद तैयार करना चाहते कर सकते है। जैविक खाद का लाभ व्यक्तिगत लाभ के साथ, समष्टि का लाभ भी है।
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