कालेज में सेवा नियमितीकरण की सीबीआइ जांच शुरू

सहरसा। शहर के दो नव अंगीभूत महाविद्यालयों में प्राध्यापक और कर्मी के नियमतीकरण मामले की सीबीआई ने जांच शुरू की है। बहाल कर्मियों की सेवापुस्तिका का सत्यापन और भुगतान मामले की जांच हो रही है।

जानकारी के अनुसार, वर्ष 1986-87 में सहरसा शहर के राजेंद्र मिश्र महाविद्यालय एवं सर्वनारायण सिंह राम कुमार सिंह महाविद्यालय को भूपेंद्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय अंतर्गत नवअंगीभूत कालेज के रूप में मान्यता दी गई थी। नवअंगीभूत महाविद्यालयों के शिक्षक और शिक्षकेत्तर कर्मचारियों को वेतन और एरियर भुगतान के लिए सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर एसबी सिंहा कमीशन आयोग वर्ष 2012-13 में गठित हुआ।
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आयोग ने अपनी जांच रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को समर्पित करते हुए शिक्षक एवं शिक्षकेत्तर कर्मचारियों को एरियर सहित वेतन आदि भुगतान करने की सहमति जतायी थी जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर विश्वविद्यालय को भुगतान करने का निर्देश दिया। इसी निर्देश के आलोक में दोनों नवअंगीभूत महाविद्यालयों के कर्मियों का भुगतान कर दिया गया। इसी बीच एरियर भुगतान को लेकर एक प्राध्यापक ने याचिका दायर कर दी। जिस याचिका की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एसबी सिंहा कमीशन आयोग द्वारा समर्पित जांच रिपोर्ट में शामिल शिक्षक व शिक्षकेत्तर कर्मचारियों के नियमितीकरण की जांच करने का निर्देश सीबीआई को दिया गया। इसी निर्देश के बाद अब सीबीआइ ने ऐसे नव अंगीभूत कालेजों में कार्यरत शिक्षक एवं शिक्षकेत्तर कर्मी जिन्हें वेतन व एरियर देने की सिफारिश एसबी सिंहा कमीशन आयेाग ने की थी। वैसे कर्मियों की जांच शुरू कर दी है। सीबीआइ के अधिकारी पिछले कई दिनों से सर्व नारायण सिंह राम कुमार सिंह महाविद्यालय में अपनी जांच करने में जुटे हैं। कर्मियों की उपस्थिति, सेवा पुस्त आदि का सत्यापन किया जा रहा है। सहरसा के दोनों महाविद्यालयों में करीब एक सौ से अधिक शिक्षक व शिक्षकेतर कर्मी शामिल हैं। जिनके सेवाकाल की जांच की जा रही है। सीबीआई यह देख रही है कि इतने वर्षों तक बिना वेतन के काम आखिर कैसे करते रहे। उनकी जीविका कैसे चलती रही। इस बीच कहीं दूसरी जगह तो नौकरी तो नहीं कर रहे थे।
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जांच कार्रवाई से मची हड़कंप
सेवा नियमितीकरण की जांच के बाद ऐसे प्राध्यापकों और कर्मचारियों के बीच हड़कंप मचा है। नियम को दरकिनार कर इस सेवा का लाभ ले चुके कर्मी व प्राध्यापक पर गाज गिर सकती है। वर्ष 1986 से ही बिना वेतन के काम कर रहे कर्मियों को उस समय सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद ही विश्वविद्यालय ने वेतनादि सहित एरियर का भुगतान किया गया। अब एक बार नए सिरे से सुप्रीम कोर्ट ने ही इसकी जांच सीबीआई को दिए जाने के बाद इसे गंभीर बना दिया है।

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