सत्य साबित हुई घटना तो मिलेगा मुआवजा

गोपालगंज। अनुसूचित जाति, जनजाति अधिनियम के तहत दर्ज होने वाले मामले अगर सत्य पाए गए तो पीड़ित व्यक्ति को मुआवजा मिलेगा। मुआवजा की यह राशि कल्याण विभाग के माध्यम से दी जाएगी। मुआवजा की राशि देने का निर्णय जिलाधिकारी की अध्यक्षता में गठित समिति के माध्यम से होगा। समिति के निर्णय के बाद पीड़ित व्यक्ति को प्रथम किस्त में कुल मुआवजा राशि का 25 प्रतिशत दिया जाता है। शेष राशि का भुगतान कांड की सुनवाई न्यायालय में पूर्ण होने के बाद दिए जाने का प्रावधान है। लेकिन अगर न्यायिक कार्रवाई में वाद में आरोपी रिहा हो जाता है तो वादी को शेष राशि नहीं मिलेगी।


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क्या है नियम
गोपालगंज : नियमों के अनुसार किसी अनुसूचित जाति या जनजाति के व्यक्ति के साथ किसी अन्य जाति के व्यक्ति द्वारा किसी भी आपराधिक वारदात को अंजाम दिया जाता है तो वैसी स्थिति में पीड़ित पक्ष आपराधिक मामला थाने में दर्ज कराता है। पीड़ित व्यक्ति द्वारा दर्ज कराए गए आपराधिक मामले की जांच में पुलिस कांड को सत्य पाते हुए आरोपी के खिलाफ आरोप पत्र समर्पित करती है। तब ऐसे मामलों में एसपी की अनुशंसा पर पीड़ित व्यक्ति को मुआवजा की राशि दी जा सकती है।
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कहां होता है अंतिम निर्णय
गोपालगंज : मुआवजा राशि देने का अंतिम निर्णय जिलाधिकारी की अध्यक्षता में गठित अनुसूचित जाति व जनजाति के लिए निगरानी एवं अनुश्रवण समिति करती है। इस समिति के सदस्यों की प्रत्येक तीन माह के अंतराल पर बैठक में इस बात का निर्णय लिया जाता है कि किस व्यक्ति को मुआवजा की राशि दी जानी है।
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कौन हैं समिति के सदस्य
गोपालगंज : इस निगरानी व अनुश्रवण समिति में जिलाधिकारी अध्यक्ष तो जिला कल्याण पदाधिकारी सचिव होते हैं। इनके अलावा एसपी, सांसद, सभी विधायक, विधान पार्षद, अनुसूचित जाति के पदाधिकारी तथा स्वयंसेवी संस्थान के सदस्य के अलावा मनोनीत किए गये तीन लोग भी इस समिति के सदस्य भी होते हैं।
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कितने के मुआवजे का प्रावधान
गोपालगंज : नियमों की बात करें तो अनुसूचित जाति व जनजाति अधिनियम में धारा 3 (1) (10) के तहत 25 हजार रुपये के मुआवजे का प्रावधान है। इसके अलावा हत्या जैसे बड़े मामलों में मुआवजा की राशि एक लाख तक हो सकती है। लेकिन समिति की स्वीकृति मिलने के बाद कुल मुआवजा राशि का 25 प्रतिशत ही पहली किश्त में प्राप्त होती है।
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वादी भी जा सकता है जेल
गोपालगंज : नियमों के अनुसार अनुसूचित जाति व जनजाति अधिनियम के तहत दर्ज होने वाले आपराधिक मामलों के अनुसंधान के दौरान अगर पुलिस किसी कांड को असत्य पाती है तो उस हालत में आरोप लगाने वाले वादी के खिलाफ भी कार्रवाई का प्रावधान है। इस प्रावधान के अनुसार उसपर दफा 182, 211 के तहत कार्रवाई हो सकती है। इस हालत में वादी को भी जेल जाना पड़ सकता है।

Posted By: Jagran
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