नव नालंदा महाविहार के कुलपति ने कुल सचिव को किया सस्पेंड

नालंदा : नव नालंदा महाविहार (डीम्ड यूनिवर्सिटी) में रजिस्ट्रार डॉ एस के सिन्हा तथा पालि विभाग के प्रो राजेश रंजन के बीच पद को लेकर वर्षों से जारी विवाद गहराता गया है। दोनों के बीच शह मात का खेल जारी होने की वजह से एक ओर जहां विवि की छवि धूमिल हो रही है, वहीं अकादमिक अव्यवस्था उत्पन्न हो गयी है। 15 जनवरी को पत्र जारी कर कुलपति ने रजिस्ट्रार डॉ. एसके सिन्हा को सस्पेंड कर दिया है। वहीं उनका प्रभार प्रो. राजेश रंजन को सौंप दिया है।

फिलहाल, स्थिति यह है कि महाविहार में शांति व बौद्ध दर्शन पढ़ाने वाले प्राध्यापकों के बीच पद व अहम को लेकर तनातनी है। ऐसा नहीं है कि फर्जी डिग्री या वरीयता को लेकर यह टकराव इधर के वर्षों में शुरू हुआ है। दोनों ही प्राध्यापक वर्षों से इस संस्थान में कार्यरत हैं। आखिर इतने दिनों तक यह व्यवस्था कैसे जारी रही? संस्थान के वीसी भी बदले साल से ज्यादा दिन बीत गए। आखिर क्या वजह थी कि किसी ने भी इसे सुलझाने की कोशिश नही की। इससे पहले भी प्रो राजेश रंजन को रजिस्ट्रार की कमान दी गयी थी। ़िफर किस ग्राउंड पर कोर्ट की मदद से डॉ एस पी सिन्हा प्रभार लेने में सफल रहे। इधर डॉ सिन्हा का कहना है कि उन्होंने ही प्रो राजेश रंजन की डिग्री की जांच की मांग वीसी से की। इसी बात को ले उन्हें हटाया गया है। जबकि महाविहार वीसी प्रो वैद्यनाथ लाभ का कहना है कि फर्जी सर्टिफिकेट मामले में विजिलेंस ने क्लीन चिट दे दी है। तो फिर कोई मामला ही नही है। वहीं सस्पेंड कुलसचिव डॉ एस पी सिन्हा ने बताया कि अभी वे पूरी बारीकी का अध्ययन कर रहे हैं। पहले विभागीय मंत्रालय स्तर पर तथा वीसी से अपील करेंगे। इसके बाद जरूरत पड़ी तो ़िफर कोर्ट का सहारा ले सकते हैं। 
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दरअसल, यह पूरा मामला प्रोफेसर राजेश रंजन से जुड़ा है। राजेश रंजन के बारे में कई वर्षों से फर्जी सर्टिफिकेट पर नौकरी करने का आरोप लग रहा था। कुलसचिव डॉ सुनील प्रसाद सिन्हा का कहना है कि हमने  प्रोफेसर राजेश रंजन के बारे में  कुलपति को लिखा था कि वह फर्जी सर्टिफिकेट से आए हैं, इनकी सीबीआई से जांच होनी चाहिए। यह एक अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त शिक्षण संस्थान है, जिसका भारत में ही नहीं बल्कि पूरे साउथ एशियन कंट्री में नाम है। ऐसे में ऐसे  व्यक्ति जो फर्जी सर्टिफिकेट पर यहां नौकरी  कर रहे हो, वह गलत है। इसकी मैंने सीबीआई से जांच की मांग की थी। इस प्रकरण में सबसे चौंकाने वाला मामला यह है कि जांच की मांग करने वाले कुलसचिव को हटा कर उसी व्यक्ति को कुलसचिव बना दिया गया, जिन पर फर्जी सर्टिफिकेट पर नौकरी करने का आरोप है। इधर, कुलपति का कहना है कि हमारे कुलसचिव मनमाने ढंग से काम कर रहे थे। उनके कार्यकलाप की टीम गठित कर जांच कराई जाएगी। उन्होंने प्रोफेसर राजेश रंजन के सर्टिफिकेट मामले पर कहा कि ऐसा कोई मामला नहीं है। बहुत पहले उनके खिलाफ नालिश की गई थी, जिसकी जांच सेंट्रल विजिलेंस टीम ने की थी। जांच में पाया गया था कि फर्जी सर्टिफिकेट के आरोप बेबुनियाद थे। उसका निराकरण वर्ष 2015 में ही हो गया था। कुछ लोग निराधार आरोपों को लेकर के बयानबाजी कर रहे हैं।
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कोर्ट, दिल्ली विवि सहित सीवीसी से मिल चुकी है क्लीन चिट : प्रो राजेश
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फर्जी डिग्री के मामले में जब  प्रोफेसर राजेश रंजन से संपर्क किया गया तो उन्होंने बताया कि पूर्व में भी इस प्रकार का निराधार आरोप लगाकर महाविहार के ही सेवानिवृत्त अध्यापक के द्वारा माननीय पटना उच्च न्यायालय में केस दायर किया गया था। साथ ही सीबीसी मुख्य सतर्कता आयुक्त नई दिल्ली एवं संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार को भी शिकायत दर्ज कराई गई थी। इस मामले में माननीय पटना उच्च न्यायालय द्वारा वर्ष 2013 में ही केस को खारिज कर दिया गया था। संस्कृति मंत्रालय ,भारत सरकार ने भी इस शिकायत को मुख्य सतर्कता आयुक्त, नई दिल्ली के द्वारा इसकी जांच करवाई थी। वर्ष 2015 में इस मामले में भी क्लीन चिट दे दी गई थी। जहां तक समान सत्र में दो डिग्री हासिल करने का केस है तो इस मामले में दिल्ली विश्वविद्यालय ने एक समिति बनाकर मेरे मार्कशीट तथा अन्य तथ्यों की जांच करने के उपरांत इसे विलंबित सत्र का मामला बताते हुए आरोप से मुक्त किया था। वहीं मगध विश्वविद्यालय के परीक्षा विभाग ने भी अपनी गलत सूचना को सुधार करते हुए मेरे प्रमाण पत्र एवं मार्कशीट को सही मानते हुए फिर से नया प्रमाण पत्र जारी किया था। विगत कई वर्षों से मुझे परेशान करने के उद्देश्य से इस प्रकार का कृत्य बार-बार किया जा रहा है। मैंने हाल में ही इस विषय को गंभीरता पूर्वक लेते हुए एक शिकायतकर्ता के खिलाफ न्यायालय में मानहानि का मुकदमा दायर करने का नोटिस भी दिया है। जिस पर कार्रवाई की जा रही है।
Posted By: Jagran
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