जीवनदायिनी नदियों के वजूद पर मंडरा रहे खतरे के बादल

नदी है तो पेड़ है और पेड़ है तो नदी। दोनों है तो मानव जीवन, लेकिन आज मानव ही नहीं पशु-पक्षियों का जीवन बचाने वालीं नदियों का वजूद मिटता जा रहा है। नदियों के आंचल से बालू गायब हो रहा है। पेड़-पौधे समाप्त होते जा रहे हैं। कभी चट्टानों को तोड़कर गर्मी में भी अविरल बहने वाली नदियां सावन में सूखी पड़ी हैं। पानी के लिए नदियां तड़प रही हैं। यह मानव जीवन के लिए शुभ संकेत नहीं है। नदियों में पानी नहीं रहने के कारण कृषि भी प्रभावित हो रही है। जिले से होकर गुजरी उत्तर कोयल, बटाने, पुनपुन, केशहर, अदरी, बतरे व झरही समेत अन्य नदियां बरसात के मौसम में सूख जाती हैं। गर्मी के दिनों में इन नदियों में दरार फटी रहती है। नदियों के मिटने का सीधा असर पशुओं पर पड़ रहा है। नदी किनारे बसे गांवों का जलस्तर लगातार नीचे गिर रहा है। नदियों में पानी गायब होने के कारण जंगल में रहने वाले पशु भटककर गांव में पहुंच जा रहे हैं। मदनपुर व देव प्रखंड के जंगल में पिछले वर्ष कई हिरण व बंदर की मौत पानी के बिना हो गई थी। दरअसल, बारिश नहीं होने के कारण नदियों में बाढ़ का पानी आना लगभग बंद हो गया है। बारिश नहीं होने, अवैध खनन व अतिक्रमण के कारण नदियों का अस्तित्व समाप्त होने की कगार पर है। पहले अविरल बहने वाली नदियां आज रेगिस्तान बनकर रह गई हैं। नदियों में पानी नहीं है। अदरी नदी, बतरे व पुनपुन नदी की स्थिति दयनीय है। अदरी नदी का अतिक्रमण कर लिया है। नदी में घर बना लिया गया है। अवैध खनन व अतिक्रमण को देखते हुए भी अधिकारी कोई कार्रवाई नहीं कर रहे हैं। पुनपुन नदी के अस्तित्व पर मंडरा रहा खतरा :


कभी अविरल बहने वाली पुनपुन नदी अपना अस्तित्व खोती जा रही है। संरक्षण के अभाव में दम तोड़ रही है। नवीनगर प्रखंड के कुंड के पास पुनपुन नदी का उद्गम स्थल स्थित है। यहां छोटे से गड्ढे से पुनपुन नदी निकलती है और नवीनगर होते हुए गंगा नदी को जाती है। जानकार बताते हैं कि पहले इस नदी में पानी की अविरल धारा बहती थी। यह नदी बरसाती बनकर रह गई है। गर्मी में चापाकल सूखने के कारण ग्रामीण इस नदी का पानी पीते थे। अतिक्रमण के कारण नदी का अस्तित्व समाप्त होने की कगार पर पहुंच गया है। पुनपुन को आदि गंगे पुनपुन की संज्ञा दी गई है। श्रद्धालु नदी में पितृ तर्पण करते हैं। इस नदी की व्याख्या पुराणों में की गई है। नवीनगर के तत्कालीन सीओ राणा अक्षय प्रताप सिंह के नेतृत्व में पुनपुन नदी को अतिक्रमणमुक्त करने की मुहिम चलाई गई थी, लेकिन यह खानापूर्ति मात्र रही। फाइल पर ही अतिक्रमण मुक्त कर दी गई। उद्गम स्थल से नवीनगर तक नदी की लंबाई करीब 11.5 किमी है। बिहार व झारखंड के सरैया, बारा, खजुरी, टंडवा व बसडीहा समेत दर्जनों गांव के बीच प्रवेश हुई है। परंतु अब इसका अस्तित्व समाप्त होने के कगार पर पहुंच गया है। बता दें कि पुनपुन नदी का अस्तित्व को बचाने एवं महत्ता और महिमा को उजागर करने के लिए पुनपुन महोत्सव का आयोजन किया जाता है। महोत्सव समिति के अध्यक्ष अभय वैद्य, सचिव राजेश अग्रवाल, शंकर प्रसाद व अरुण कुमार सिंह ने बताया कि पुनपुन नदी का अस्तित्व को बचाने की जरूरत है। इसके लिए सरकार व अधिकारियों को जागरूक होना होगा। अगर पुनपुन नदी की स्थिति सुधर जाए तो सैकड़ों गांवों के लिए जीवनदायिनी बन जाएगी। ग्रामीणों ने बताया कि नदी का मिटते अस्तित्व का सीधा अगर गांवों पर पड़ रहा है। दिन-प्रतिदिन जलस्तर गिरता जा रहा है। 30 करोड़ की परियोजना पर खर्च हो गए 900 करोड़ रुपये :
1972 में 1.25 लाख हेक्टेयर जमीन की सिचाई के लिए उत्तर कोयल परियोजना का खाका तैयार हुआ था। तब परियोजना पर मात्र 30 करोड़ रुपये खर्च होता। वर्तमान में इस परियोजना पर 900 करोड़ रुपये से अधिक व्यय हुआ है, परंतु परियोजना अधूरी पड़ी है। 46 वर्षों में न जाने कितनी पीढि़यां गुजर गई, लेकिन सत्ता और व्यवस्था के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। परियोजना के गति पकड़ने के आसार बढ़े हैं, परंतु धरातल पर काम दिखाई नहीं दे रहा है। झारखंड में कुटकु डैम का निर्माण होना है, परंतु अब तक नहीं हो सका है। जब तक डैम में गेट नहीं लगेगा, नहर से किसानों को पर्याप्त पानी नहीं मिलेगी। कुटकु डैम में 1170 मिलियन घनमीटर जल भंडारण की क्षमता होगी। विभाग के अभियंता बताते हैं कि 1972 में परियोजना की प्राक्कलित राशि 30 करोड़ थी। जो 1974 में 58 करोड़, 1977 में 114 करोड़, 1998 में 836 करोड़ एवं 2006 में 1289 करोड़ जा पहुंची। परियोजना पर अब तक 900 करोड़ रुपये खर्च हो चुका है। 6 मार्च 2017 के एडवाइजरी कमेटी की बैठक में कार्य को पूरा करने के लिए 900 करोड़ रुपये खर्च करने के बाद 1622 करोड़ की मंजूरी दी गई। करोड़ों रुपये खर्च हो जाने के बाद भी किसानों के खेत तक पानी नहीं पहुंच सका। परियोजना के जीर्णोद्धार कार्य का शिलान्यास 5 जनवरी 2019 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा किया गया है। मदनपुर प्रखंड के जमुनिया गांव के किसान मुरारिक यादव, सिजुआही के राजेश यादव, शिवनारायण यादव, अमरजीत कुमार, चिल्हमी के आशीष यादव, शिवदत्त यादव व रतनुआं के रामप्रवेश यादव ने बताया कि पानी की आस में आंखें पथरा गई हैं। वर्षों से उत्तर कोयल नहर में पानी का इंतजार है। स्थिति यह होता है कि पानी के बिना खेती नहीं हो पाती है। भूमि बंजर रह जाता है। सरकार द्वारा इस पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
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क्या कहते हैं अधिकारी :
नदी जीवनदायिनी है। इसे बचाना सभी का दायित्व है। कुछ मानवीय भूलों के कारण भी परेशानी बढ़ी है। नदियों से अतिक्रमण हटवाया जा रहा है। अवैध खनन को रोका जा रहा है। अवैध खनन करते हुए पकड़े जाने पर कार्रवाई की जा रही है। जल-जीवन-हरियाली अभियान के तहत जल एवं पर्यावरण संरक्षण का कार्य किया जा रहा है। इसमें सभी लोगों का सहयोग की आवश्यकता है।
-सुधीर कुमार, एडीएम, औरंगाबाद।
----------------- नदी का अस्तित्व बचाने के लिए कार्य किया जा रहा है। नदियों की उड़ाही कराई जा रही है। जल-जीवन-हरियाली के तहत जल संरक्षण का कार्य किया जा रहा है। इसको लेकर सभी अधिकारी सजग हैं। नदियों की सूखने का असर गांवों पर पड़ रहा है। जलस्तर गिरता जा रहा है। इसे बचाने का कार्य किया जा रहा है।
-राजीव कुमार, कार्यपालक अभियंता।
पीएचईडी, औरंगाबाद।
Posted By: Jagran
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