शहरनामा सुपौल :

आशीर्वाद भी, खौफ भी

कोसी के कछेर में बसा यह सुपौल जिला अपने आप में अनूठा है। यहां लगभग तीस साल से बाबा की ही चलती है। बाबा का आशीर्वाद है तो आप हैं, आशीर्वाद नहीं तो फिर आप यहां कैसे टिकेंगे? वैसे भी बगैर बाबा के आशीर्वाद के आप यहां आ ही नहीं सकते। जब बाबा ने आशीर्वाद दे दिया तो सात खून माफ। लेकिन हाल के वर्षो में भैया के खौफ ने लोगों को भयभीत कर दिया है। भैया भ्रष्टाचार को जरा सा भी पसंद नहीं करते। जरा सा भी कहीं डगमगाए और भैया को दिख गया तो फिर भगवान ही बचाए। जानकारी मिलते ही भैया पूरे प्रकरण के पोस्टमार्टम में जुट जाते हैं। कागज से एकदम से मजबूत और पूरा सबूत जुटाकर इस प्रकरण को अंजाम तक पहुंचा ही देते हैं। उदाहरणों की लंबी फेहरिश्त है। यहां आने वाले अधिकारी आशीर्वाद और खौफ के बीच की चक्की में पिस जाते हैं।
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हाकिम तो हो ही गए हैं
वे बिहार प्रशासनिक सेवा से नहीं हैं, लेकिन बड़े साहब की कृपा हो गई तो अधिकारी भी कहलाने लगे। आम लोगों को क्या पता कि सामने वाला है क्या? उन्हें हाकिमों वाला ट्रीटमेंट मिलने लगा। पहले वाले साहब के गउवां थे तो कृपा बरसी। बाद वाले साहब समझे कि काबिल टाइप का आदमी होगा। अब तो उनका चाल-ढाल सब बदल गया है। जिले के विकास और संपर्क का जिम्मा मिला तो उनके तेवर भी चढ़ गए। उन्होंने महसूस किया कि दूसरों का पर्दाफाश करने वाला तो मेरा ही अधीनस्थ हो गया। फिर क्या! अब विभाग और दायित्व का कोई मतलब नहीं रह गया उनके लिए। हों भी क्यों नहीं, अब हाकिम तो हो ही गए हैं। वैसे साहब न चाहते तो हाकिमों वाला रुतबा कहां से होता! रुतबे में अब उन्होंने बड़े साहब का ख्याल भी छोड़ दिया है, कोई भी पत्र हो डायरेक्ट जारी करने में उन्हें गुरेज नहीं।
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वे क्यों करें माथापच्ची
वे स्वास्थ्य के बड़े ओहदेदारों में हैं। जब से ओहदा मिला तब से काम करना ही जैसे भूल ही गए हैं। हमेशा अपनी राग अलापते हैं। विभाग का बहुत कुछ पता भी रखना नहीं चाहते। कहते हैं, हम क्यों रखें पता। सरकार के आदमी तो कदम-कदम पर हैं, सरकार ही रखे पता। शुरू के कुछ दिनों तक तो उनका दिन ऐसे ही कट गया।तब कहते थे, अभी तो नए-नए आए हैं देख लेते हैं, पता कर लेते हैं। अभी जब पूरा देश कोरोना के संक्रमण काल से गुजर रहा है, सभी अपनी जिम्मेवारी बखूबी निभा रहे हैं। वहां इनकी जवाबदेही तो कुछ अधिक ही बढ़ गई है। लेकिन अभी के माहौल में भी उनके पास गजब की निश्चितता है। बड़ी से बड़ी बात हो जाए उन्हें कोई चिता नहीं। आखिर सबकी जवाबदेही है, बड़े-बड़े अधिकारी लगे हैं, सरकार भी उन्हीं से जवाब मांगती है तो फिर वे माथापच्ची क्यों करें?
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अजब-गजब है कार्यप्रणाली
अजूबा जिला है साहब सुपौल। एक से एक ख्याति है इसके नाम। यहां हाकिमों की कार्यप्रणाली भी अजब-गजब है। अब देखिए ताजातरीन मामला। कोरोना का संक्रमण काल है। पूरी व्यवस्था संवेदनशील है। एक वरीय पदाधिकारी ने पत्र निर्गत किया दो विभाग के नाम। पत्र में जिला प्रोग्राम पदाधिकारी और कार्यपालक पदाधिकारी नप के नाम मैसेज था। उसमें दोनों विभाग के अंतर्गत कार्य करने वाली टीम से रिपोर्ट लेनी थी। पत्र जिला प्रोग्राम पदाधिकारी के कार्यालय से जारी हुआ और नप के कार्यपालक पदाधिकारी ने भी उस पर अपना दस्तखत कर दिया। इतना ही नहीं बड़े साहब ने जो रिपोर्ट की तारीख तय की उसके नीचे वाले हाकिमों ने उसमें एक दिन का और समय बढ़ा दिया। उससे नीचे वाले पदाधिकारी ने अपने दो अधीनस्थ के नाम पत्र जारी कर दिया। सूचना वाले अधिकारी तो कोई भी पत्र जारी करने से गुरेज नहीं करते। हवाला मौखिक आदेश का क्यों नहीं हो।
Posted By: Jagran
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